सुकून...!😊

*सुकून * ....!

       आजकल खुदको मजबूत बनाने की कोशिश कर रही हू। नए लोगों से बात करती हू। नए खयाल ढालने की दिल से कोशिश करती हू। आज में अकेली बैठी हुई हू। आसपास कुछ पेड़-पौधे है, कुछ पंछी है। वो परबत है जो मैं बचपन से देखती आयी हू। आज में अपनी प्यारी दोस्त कलम से भी छुपकर बैठी हू। कुछ ऐसा खोज रही हू जिससे मेरे मन में चल रहा तुफान रूक जाए। किसी समुंदर की धारा की तरह में बैचेन हू। मुझे बस इतना पता है, कुछ सवाल मेरे है जिनको खोजना सिर्फ मुझे है। निराशा के बारे में मैं सोचना भी नहीं चाहती। जब कभी अकेली बैठती हू। मेरा मन मुझसे बाते करता है। वैसे तो हर घडी वो साथ होता है।।लेकिन जब कभी मुझे कुछ फैसला करना हो तो वो ज्यादा समझदार हो जाता है। हिंदी में लिखने की वजह हिंदी मुझे प्यारी लगती है । मुझे अपनापन महसूस होता है। 

               कुछ समय ऐसा भी होता है जब हमें किसी और के समझाने की जरूरत नहीं होती। बीते पलों के बारे में सोचकर आज को भूलना भला कहा की समझदारी है? कई फिल्में देखकर में उनका समीक्षण करना पसंद करती हू। कुछ किस्से हमारी जिंदगी से जुड़े होते है। रंगमंच का जब कभी चिंतन करती हू मुझे वो नकली दुनिया भी असली इन्सान दिखाती है। रंगमंच की तरह असली जिंदगी नहीं होती। फिर भी मैं उस कल्पना में खोना पसंद करती हू। मेरे लफ्ज आपको तभी समझ में आएंगे जब आप वो महसूस करोगे। 

             ख्वाईश के बिना जीवन आसान है लेकिन उस जीवन में अजीब-सी पीड़ा है। कल किसी को मालूम नही होता लेकिन सब उसी को संवारने में जुटे हुए है। में भी उन्हीं में से एक हू। कल की चिंता के कारण उदास बैठी हुई हू। जो हररोज करती हू वो सबकुछ आज भी कर लिया लेकिन उसमें कोई उत्साह नहीं था। मुझे पता है मैं सबको धोखा दे सकती हू लेकिन खुदको नहीं। साँस तो ले रही हू फिर भी लग रहा है किसी बंद कमरे में घुटकर, डरकर आवाज दे रही हू। सुनने वाला कोई नहीं ये जानकर में चूप हो गई हू। ख़याल से बाहर आकर उस तितली की ओर में  देख रही हू जो पता नहीं कहाँ जाना चाहती है। वो तितली मानो मुझसे कुछ कहना चाहती हू। जब कभी हम किसी एक तकलीफ के बारे में सोचते है उसके अलावा बाकी आशा के सुनहरे दरवाजे हम बंद करने लगते है।

"कुछ पल की है जिंदगी 
हर पल बस जीना चाहिए...!"



           कोशिश से सब मुमकिन है। मैं बस वहीं करूंगी। मैंने तय कर लिया है। कल क्या होगा पता नहीं लेकिन आज के लिए सबसे ज्यादा कोशिश जरूरी है। मैं उस तितली की तरह उडूंगी। कागज पर लिखने के लिए मेरे अल्फाज बैचेन है। अजीब से सुकून की तलाश में सारा जहाँ भूलकर बस कागज के किसी पन्ने पर बैठने के लिए तड़प रहे है। उनकी तड़प मुझे अच्छी नहीं लगती। मैं उनको लिख रही हू....उनको महसूस कर रही हू...ये जो पल है उस में सुकून महसूस कर रही हू....

- मयुरी खानविलकर, सातारा

Comments

  1. धन्यवाद 😊 असंच स्नेह राहू द्या

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  2. बहुत अच्छी तरह से संगठित और वास्तव में जीवन जीने के तरीके पर इस लेख से सीखने में बहुत अच्छा लगा। मुझे यह लेख पसंद आया। अच्छा लेखन जारी रखें।

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